भगवान विष्णु को समर्पित, त्रियुगीनारायण का मंदिर उत्तराखण्ड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। देहरादून से इस प्राचीन मंदिर की दूरी 252 किमी की है, जहाँ श्रद्धालु सड़क मार्ग से आ सकते है। जग के नारायण भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर बेहद ही ख़ास माना जाता है। पौराणिक कथा अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह मंदिर की प्रांगढ़ में भगवान विष्णु की उपस्थिति में हुआ था। प्रत्येक वर्ष हजारो की संख्या में लोग इस मंदिर में शादी करने आते है। चमोली जिले स्थित इस मंदिर का राज्य सरकार द्वारा अब डेस्टिनेशन वेडिंग के रूप में भी बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे और अधिक संख्या में लोग मंदिर में शादी करने आए। इससे स्थानीय लोगो के लिए रोजगार और राज्य में पर्यटन के अवसर को बढ़ाने में भी मदद मिल सकेगी।
कहा जाता है की मंदिर का निर्माण हिन्दू गुरु अदि शंकराचार्य जी द्वारा 8 वी शताब्दी के दौरान किया गया था। मंदिर की संरचना हूबहू केदारनाथ मंदिर जैसी प्रतीत होती है। पहाड़ो के बीच में स्थित मंदिर के चारो तरफ हरे भरे पहाड़ और दूर बर्फ से ढकी चोंटिया बेहद ही विहंगम नजारा प्रस्तुत करती है। मंदिर में भगवान हरी की दो फ़ीट ऊँची मूर्ति बेहद ही आकर्षक है जिसको देखने मात्र से ही मन और आत्मा दोनों ही मंत्रमुग्ध हो जाते है। मंदिर प्रांगढ़ में चौकोर रूप में हवन कुंड इसका मुख्य केंद्र माना जाता है। कहा जाता है की इस कुंड की अग्नि को साक्षी मानकर भगवान शिव और पार्वती ने सात फेरे लिए थे।
साथ ही विद्वान् द्वारा यह भी बताया जाता है की इस कुंड में जलने वाली आग तीन युगो से जलती हुई आ रही है, जिस कारण मंदिर का नाम त्रियुगी पढ़ा। इसकी अखंड अग्नि से मंदिर अखंड धुनि के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसके हवन कुंड में अक्सर श्रद्धालु लकड़ी की आहुति देते है और कुंड से निकलने वाली राख को विवाहित जीवन के लिए वरदान माना जाता है। कहा जाता है की हिमावत की पुत्री माता पार्वती जो की माता सती का ही पुनर्जन्म थी, भगवान शिव को अपनी सुंदरता से मोहित करना चाहती थी, लेकिन सफलता हाथ न लगने पर उन्होंने यहाँ से पांच किमी दूर गौरीकुंड में शिव को पाने हेतु कठोर तपस्या की और फलस्वरूप शिव को प्राप्त किया।
भक्त त्रियुगीनारायण मंदिर में दर्शन उपरांत गौरीकुंड स्थित माता पार्वती के मंदिर दर्शन करने अवश्य जाते है। शिव पार्वती की शादी में मुख्य भूमिका भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई रूप में निभाई थे, वही ब्रह्मा जी पुजारी के रूप में उपस्थित थे। बताया जाता है की जिस स्थान पर शादी हुई थी उस स्थान को चिन्हित करने के तौर पर एक शिला रखी गई थी, जिसे लोग ‘ब्रह्म शिला’ के नाम से जानते है। यहाँ स्थित रुद्रकुंड, विष्णु कुंड, और ब्रह्म कुंड काफी पवित्र माने जाते है। कहा जाता है की शादी से पहले सभी देवताओ ने इन्ही कुंडो में स्नान किया था। तीनो ही कुंड अपनी एक विशेष पहचान लिए हुए है, रूद्र कुंड नहाने के लिए, विष्णु कुंड पवित्रता के लिए और सरस्वती कुंड तर्पण के लिए प्रयोग में लाए जाते है। इन तीनो कुंडो में पानी मंदिर स्थित सरस्वती कुंड से प्रवाहित होकर जाता है, जिसकी मान्यता है की यह पानी भगवान विष्णु की नाभि से प्रवाहित होता है।
लोगो में ऐसी भी धारण प्रचलित है की इस कुंड में निसंतान स्त्री के स्नान मात्र से संतान उत्पत्ति में हो रही बाधा दूर होती है। श्रद्धालु मंदिर में वर्ष में कभी भी आ सकते है लेकिन सबसे उत्तम समय सितम्बर से अप्रैल का माना जाता है। करीब 6,500 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित मंदिर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है लेकिन मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको कुछ मार्ग चलकर पूरा करना होगा। ऐसे व्यक्ति जो मंदिर में शादी करने की इच्छा रखते हो मंदिर समिति को पूर्व में सूचित करके उसकी आज्ञा अवश्य प्राप्त कर ले। मंदिर के निकट रहने की व्यवस्था सिमित संख्या में उपलब्ध है।